मंगल दोष (मांगलिक)

यह है क्या

मंगल दोष का अर्थ है कुंडली में मंगल का पहले, दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में होना। शास्त्र इसे विवाह पर पड़ने वाले दबाव से जोड़ते हैं - मंगल ऊर्जा, आवेग और टकराव का कारक है, और ये भाव शरीर, कुटुंब, घर, जीवनसाथी, आयु और व्यय के हैं।

यह कोई बीमारी नहीं है और न ही कोई श्राप। यह एक ग्रह-स्थिति है, जो लगभग हर तीन में से एक कुंडली में मिलती है। अगर यह सचमुच वैसी आपदा होती जैसी बताई जाती है, तो देश की एक-तिहाई शादियाँ उसका प्रमाण होतीं।

कैसे जाँचा जाता है - और कहाँ मतभेद है

गिनती लग्न से की जाती है। कई परंपराएँ चंद्र से और शुक्र से भी देखती हैं, और तीनों में उत्तर अलग आ सकता है।

सबसे बड़ा मतभेद दूसरे भाव पर है: उत्तर भारत में उसे प्राय: गिना जाता है, दक्षिण में प्राय: नहीं। इसका सीधा अर्थ यह है कि एक ही कुंडली एक ज्योतिषी के यहाँ मांगलिक और दूसरे के यहाँ नहीं हो सकती - और दोनों अपनी परंपरा के भीतर ठीक होंगे।

कई मानक निवारण भी हैं: मंगल का अपनी राशि (मेष, वृश्चिक) या उच्च राशि (मकर) में होना, गुरु की दृष्टि, और सबसे सामान्य - दोनों पक्षों की कुंडली में दोष का होना, जिसे परंपरा परस्पर निवारण मानती है।

शांत, पारंपरिक उपाय

मंगलवार का व्रत। हनुमान चालीसा। लाल मसूर या गुड़ का दान। मंगल के बीज मंत्र का जप।

ये सब नि:शुल्क या लगभग नि:शुल्क हैं, और परंपरा यही कहती है। जो कोई इसे 'काटने' के लिए महँगा रत्न, विशेष पूजा या किसी ख़ास मंदिर का पैकेज बेचे - वह डर बेच रहा है। दोष की पहचान करने वाला ही अगर उसका महँगा इलाज भी बेच रहा हो, तो यह इस क्षेत्र का सबसे पुराना व्यापारिक ढाँचा है।

अपनी कुंडली में मुफ़्त जाँचिए