पितृ दोष
यह है क्या
पितृ दोष का भाव है पूर्वजों से जुड़ा कोई अधूरापन - प्राय: यह कहा जाता है कि किसी पीढ़ी में अंतिम संस्कार या श्राद्ध ठीक से नहीं हुआ, या परिवार में किसी के साथ अन्याय हुआ। कुंडली में इसे सूर्य के साथ राहु या केतु की स्थिति से, या नवें भाव (पिता, पूर्वज) के पीड़ित होने से जोड़ा जाता है।
ध्यान दीजिए कि यह व्याख्या कितनी खुली है। 'नवाँ भाव पीड़ित' की परिभाषा हर परंपरा में अलग है, और लगभग हर कुंडली में कोई न कोई ऐसी स्थिति मिल ही जाती है जिसे इस नाम से पुकारा जा सके। यही वजह है कि यह दोष इतनी बार 'मिलता' है।
कैसे पहचाना जाता है - और कहाँ मतभेद है
सबसे आम कसौटी: सूर्य के साथ राहु या केतु की युति, या नवें भाव या नवमेश पर उनका प्रभाव। कुछ परंपराएँ दूसरे और बारहवें भाव को भी देखती हैं।
कोई एक मानक परिभाषा नहीं है। शास्त्रीय ग्रंथों में 'पितृ दोष' नाम से अलग अध्याय नहीं है जैसा मंगल दोष के लिए मिलता है। इसलिए दो ज्योतिषी एक ही कुंडली पर अलग उत्तर दे सकते हैं, और प्राय: देते हैं।
शांत, पारंपरिक उपाय
पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण - जो परिवार वैसे भी करते हैं। अमावस्या पर पूर्वजों के नाम से दान। कौओं, गाय या ज़रूरतमंदों को भोजन। पीपल को जल।
ये सब आपके अपने हाथ से, बिना किसी बिचौलिए के हो सकते हैं, और परंपरा में यही कहा गया है। पितृ दोष के नाम पर किसी विशेष स्थान की महँगी पूजा का पैकेज बेचने वाले बहुत हैं। जो व्यक्ति दोष बताए और उसी का सशुल्क निवारण भी बेचे, उस पर भरोसा करने से पहले दो बार सोचिए।